होने थे जितने खेल मुक़द्दर के हो गएहम टूटी नाव ले के समुंदर के हो गएख़ुश्बू हमारे हाथ को छू कर गुज़र गईहम फूल सब को बाँट के पत्थर के हो गए— Irfan Jafri