जब दुआएँ भी कुछ असर न करें

क्या करें सब्र हम अगर न करें

दास्तां ख़त्म हो ही जाएगी
आप क़िस्से को मुख़्तसर न करें

छोड़ता ही नहीं हमें सय्याद
वर्ना पर्वा-ए-बाल-ओ-पर न करें

क़ाबिल-ए-अफ़्व मैं नहीं न सही
न करें आप दर-गुज़र न करें

उन को एहसास-ए-दर्द-ए-दिल कैसा
मर भी जाऊँ तो आँख तर न करें

उस की बेचारगी का क्या कहना
जिस की आहें भी कुछ असर न करें

ये भी तश्हीर-ए-शाएरी है 'जोश'
आप दीवान मुश्तहर न करें

— Josh Malsiyani

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