मेरे ग़म को भी जान पाती तुम
दिल न औरों से फिर लगाती तुम
ख़ैरियत पूछनी थी मुझ सेे तो
मेरे दिल के क़रीब आती तुम
मेरी नींदों का रुख़ भी करती अगर
बिखरे ख़्वाबों को फिर सजाती तुम
उड़ती पेड़ों से जब कोई चिड़िया
उसके बदले में चहचहाती तुम
कोई तो है वहॉं मिरे जैसा
यूँँॅं मुझे फिर न भूल जाती तुम
होता जब ज़िक्र-ए-जू'न महफ़िल में
मेरी ग़ज़लों को गुनगुनाती तुम
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