ज़रा सी बात को दिल से लगाए बैठे हैं
मनाऊँ कैसे उन्हें तमतमाए बैठे हैं
कहा था फ़ोन पे घर आ के चाँद देखूँगा
झुका के सर को वो बिस्तर पे हाए बैठे हैं
मुझे गिला है मुहब्बत उन्हें नहीं मुझसे
उधर वो कब से यूँँ बत्ती बुझाए बैठे हैं
मिले थे मुझसे वो जब शायरी की महफ़िल में
तभी से दिल में वो मेरे समाए बैठे हैं
हमें ही थामना होगा अमन का अब परचम
ये नेता लोग तो हमको लड़ाए बैठे हैं
सिखा रहे हैं वो अब जू'न को वफ़ादारी
इधर उधर जो सभी को फँसाए बैठे हैं
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