Basir Sultan Kazmi

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Basir Sultan Kazmi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Basir Sultan Kazmi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

गिला भी तुझ से बहुत है मगर मोहब्बत भी वो बात अपनी जगह है ये बात अपनी जगह — Basir Sultan Kazmi

Ghazal

ज़ख़्म तुम्हारे भर जाएँगे थोड़ी देर लगेगी बे-सब्री से काम लिया तो और भी देर लगेगी साहब आज तो अपना काम करा के जाएँगे हम सारी शर्तें पूरी हैं फिर कैसी देर लगेगी यूँँ बेहाल न हो ऐ दिल बस आते ही होंगे वो कल भी देर लगी थी उन को आज भी देर लगेगी सीख लिया है मैं ने अपने आप से बातें करना फ़िक्र नहीं उन को आने में कितनी देर लगेगी कौन रुके अब उस के दर पर शाम हुई घर जाएँ इतना ज़रूरी काम नहीं है जितनी देर लगेगी इतनी देर में कुछ के कुछ हो जाएँगे हालात ख़त लिखने से ख़त मिलने तक जितनी देर लगेगी मार-गज़ीदा कौन बचा है 'बासिर' शुक्र करो तुम ठीक भी हो जाओगे लेकिन ख़ासी देर लगेगी — Basir Sultan Kazmi
कितनी ही बे-ज़रर सही तेरी ख़राबियाँ 'बासिर' ख़राबियाँ तो हैं फिर भी ख़राबियाँ हालत जगह बदलने से बदली नहीं मिरी होती हैं हर जगह की कुछ अपनी ख़राबियाँ तू चाहता है अपनी नई ख़ूबियों की दाद मुझ को अज़ीज़ तेरी पुरानी ख़राबियाँ जूँही तअ'ल्लुक़ात किसी से हुए ख़राब सारे जहाँ की उस में मिलेंगी ख़राबियाँ सरकार का है अपना ही मेआ'र-ए-इंतिख़ाब यारो कहाँ की ख़ूबियाँ कैसी ख़राबियाँ आदम ख़ता का पुतला है गर मान लें ये बात निकलेंगी इस ख़राबी से कितनी ख़राबियाँ उन हस्तियों की राह पे देखेंगे चल के हम जिन में न थीं किसी भी तरह की ख़राबियाँ बोएँगे अपने बाग़ में सब ख़ूबियों के बीज जड़ से उखाड़ फेंकेंगे सारी ख़राबियाँ 'बासिर' की शख़्सियत भी अजब है कि इस में हैं कुछ ख़ूबियाँ ख़राब कुछ अच्छी ख़राबियाँ — Basir Sultan Kazmi
होते हैं जो सब के वो किसी के नहीं होते औरों के तो क्या होंगे वो अपने नहीं होते मिल उन से कभी जागते हैं जिन के मुक़द्दर तेरी तरह हर वक़्त वो सोए नहीं होते दिन में जो फिरा करते हैं हुशियार ओ ख़बर-दार वो मेरी तरह रात को जागे नहीं होते हम उन की तरफ़ से कभी होते नहीं ग़ाफ़िल रिश्ते वही पक्के हैं जो पक्के नहीं होते अग़्यार ने मुद्दत से जो रोके हुए थे काम अब हम भी ये देखेंगे वो कैसे नहीं होते नाकामी की सूरत में मिले ताना-ए-ना-याफ़्त अब काम मिरे इतने भी कच्चे नहीं होते शब अहल-ए-हवस ऐसे परेशान थे 'बासिर' जैसे मह-ओ-अंजुम कभी देखे नहीं होते — Basir Sultan Kazmi
ये नहीं है कि तुझे मैं ने पुकारा कम है मेरे नालों को हवाओं का सहारा कम है इस क़दर हिज्र में की नज्म-शुमारी हम ने जान लेते हैं कहाँ कोई सितारा कम है दोस्ती में तो कोई शक नहीं उस की पर वो दोस्त दुश्मन का ज़ियादा है हमारा कम है साफ़ इज़हार हो और वो भी कम-अज़-कम दो बार हम वो आक़िल हैं जिन्हें एक इशारा कम है एक रुख़्सार पे देखा है वो तिल हम ने भी हो समरक़ंद मुक़ाबिल कि बुख़ारा कम है इतनी जल्दी न बना राय मिरे बारे में हम ने हमराह अभी वक़्त गुज़ारा कम है बाग़ इक हम को मिला था मगर उस को अफ़्सोस हम ने जी भर के बिगाड़ा है सँवारा कम है आज तक अपनी समझ में नहीं आया 'बासिर' कौन सा काम है वो जिस में ख़सारा कम है — Basir Sultan Kazmi