khat men kya kya likhoon yaad aati hai har baat pe baat | ख़त में क्या क्या लिखूँ याद आती है हर बात पे बात

  - Basir Sultan Kazmi

ख़त में क्या क्या लिखूँ याद आती है हर बात पे बात
यही बेहतर कि उठा रख्खूँ मुलाक़ात पे बात

रात को कहते हैं कल बात करेंगे दिन में
दिन गुज़र जाए तो समझो कि गई रात पे बात

अपनी बातों के ज़माने तो हवा-बुर्द हुए
अब किया करते हैं हम सूरत-ए-हालात पे बात

लोग जब मिलते हैं कहते हैं कोई बात करो
जैसे रक्खी हुई होती हो मिरे हात पे बात

मिल न सकने के बहाने उन्हें आते हैं बहुत
ढूँड लेते हैं कोई हम भी मुलाक़ात पे बात

दूसरों को भी मज़ा सुनने में आए 'बासिर'
अपने आँसू की नहीं कीजिए बरसात पे बात

  - Basir Sultan Kazmi

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