ये नहीं है कि तुझे मैं ने पुकारा कम है

मेरे नालों को हवाओं का सहारा कम है

इस क़दर हिज्र में की नज्म-शुमारी हम ने
जान लेते हैं कहाँ कोई सितारा कम है

दोस्ती में तो कोई शक नहीं उस की पर वो
दोस्त दुश्मन का ज़ियादा है हमारा कम है

साफ़ इज़हार हो और वो भी कम-अज़-कम दो बार
हम वो आक़िल हैं जिन्हें एक इशारा कम है

एक रुख़्सार पे देखा है वो तिल हम ने भी
हो समरक़ंद मुक़ाबिल कि बुख़ारा कम है

इतनी जल्दी न बना राय मिरे बारे में
हम ने हमराह अभी वक़्त गुज़ारा कम है

बाग़ इक हम को मिला था मगर उस को अफ़्सोस
हम ने जी भर के बिगाड़ा है सँवारा कम है

आज तक अपनी समझ में नहीं आया 'बासिर'
कौन सा काम है वो जिस में ख़सारा कम है

— Basir Sultan Kazmi

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