शम्स देखा कभी क़मर देखा

अक्स तेरा ही था जिधर देखा

अस्ल में वो न था रफ़ीक़-ए-सफ़र
ख़्वाब में जिस को हम-सफ़र देखा

इस से पहले कि मैं उसे देखूँ
मैं ने पहले इधर-उधर देखा

बा-ख़बर देखने के बाद उस को
जब भी देखा तो बे-ख़बर देखा

मुख़्तसर किस तरह हो ये क़िस्सा
मैं ने क्या क्या न उम्र भर देखा

शाम याद आ गया तिरा चेहरा
रात भर चाँद बाम पर देखा

था वो मश्शाक़ दिल लगाने में
उस में बस मैं ने ये हुनर देखा

आख़िरश वो सँभल गया जिस को
ठोकरें खाते दर-ब-दर देखा

— 'June' Sahab Barelvi

More by 'June' Sahab Barelvi

Other ghazal from the same pen

See all from 'June' Sahab Barelvi →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling