आरज़ू-ए-वस्ल दिल से मिरे जाती नहीं
आजकल बाद-ए-सबा दिल को बहलाती नहीं
आज भी ज़िंदा है एहसास तेरे होने का
तेरी ख़ुशबू इन लिबासों से अब जाती नहीं
दिल परेशाँ है ग़म-ए-इश्क़ में मायूस है
गर्दिश-ए-तूफ़ाॅं की आहट इसे आती नहीं
यूँ तड़पना इश्क़ में रात दिन का जागना
ये मोहब्बत हर किसी को समझ आती नहीं
है बड़ा मुश्किल समझना दिल-ए-नाशाद का
इश्क़ है ऐसी बला छोड़ के जाती नहीं
मंज़िलें भी दूर आसाँ न कोई रास्ता
चल पड़े जो राह घर वो तेरे जाती नहीं
कोई होता जो तुम्हें चाहता मेरी तरह
हम दुआ भी दें तो कोई असर लाती नहीं
— Anand Sharma















