कैसी गुज़र रही है हमारी न पूछिए
बर्बाद ज़िन्दगी की कहानी न पूछिए
आँखों में दिख रही है ग़रीबी की दास्ताँ
हर बात को हमारी ज़बानी न पूछिए
माना रहे हैं क़ैद निगाहों के जाल में
किस शर्त पे मिली है रिहाई न पूछिए
बाज़ार सा लगा है सर-ए-आम जिस्म का
कितने में बिक रही है जवानी न पूछिए
लो आ गए हैं ज़द में सभी के मकाँ यहाँ
बस्ती में आग किस ने लगाई न पूछिए
— Anand Sharma















