बहुत सी नज़्में कही थीं मैं ने
लिखें भी लिख लिख के फाड़ डालें
जो शायद नाज़ुक तब्अ' पे तेरी गराँ गुज़रतीं
कि जानती थी वो सारे मौसम
जो तेरे अंदर हैं आते जाते
परख चुकी थी मैं तेरे दिल की तमाम रुत को
मैं तेरी सोचों से आश्ना थी
इसी लिए तो
बहुत सी नज़्में कही थीं लेकिन
— Kahkashan Tabassum















