इश्क़ की लत लगाकर कहाँ चल दिए

मय-क़दे को दिखा कर कहाँ चल दिए

चाहता है ये महरूम तुझ को मग़र
सब मरासिम मिटाकर कहाँ चल दिए

सारी शर्तें हैं मंज़ूर गर्दिश है क्या
दिल-ए-नादाँ बता कर कहाँ चल दिए

रह-रवान-ए-तमन्ना तुम्हारी है बस
हाथ मुझ से छुड़ा कर कहाँ चल दिए

हम उन्हें भूल जाएँ ये मुमकिन नहीं
वो हमें फिर भुलाकर कहाँ चल दिए

साथ चलने की आशा में बैठा रहा
कद वो अपना बढ़ाकर कहाँ चल दिए

राहत-ए-जाँ नहीं मिल रही है 'प्रखर'
दिल मिरा यूँ दुखा कर कहाँ चल दिए

— Pakhar Mishra 'Pranshu'

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