मुझ को बता तो देती कैसे दवाई करता

तू तो नहीं था मैं जो अब बे-वफ़ाई करता

कितनी की हैं तिरी तारीफें गुज़िश्ता लम्हा
मैं किस तरह भला अब तेरी बुराई करता

इंसान कम यहाँ बिच्छू और साँप सारे
इस शहर में भला किस से आशनाई करता

पिंजरे से तेरे गर हो जाता रिहा मैं तो फिर
उन बे-ज़बाँ परिंदों की मैं रिहाई करता

जिस ने तबाह की मेरी ज़िंदगी उसी से
ये था गुमाँ मिरा कमरा रौशनाई करता

— Rovej sheikh

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Gaon Shayari

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