gar bina matlab mujhe mehfil se uth kar jaana hai | गर बिना मतलब मुझे महफ़िल से उठ कर जाना है

  - Rovej sheikh

गर बिना मतलब मुझे महफ़िल से उठ कर जाना है
तो नहीं जाना कहीं भी मुझको फिर मर जाना है

एक अरसे बाद दिल से आई है आवाज़ कुछ
अब तो याँ से लौट जाओ हमको अब घर जाना है

काँ से काँ मैं आ गया हूँ तुम सेे मिलने के लिए
एक तुम हो दोस्त तुमको आज दफ़्तर जाना है

और फिर हम जाने अंजाने से मिल जाएँ कहीं
तो तुम्हें मुझ को नज़र-अंदाज़ फिर कर जाना है

अब परेशाँ हो गया हूँ तेरी इन यादों से मैं
अब तिरी बेदर्द इन यादों से बाहर जाना है

  - Rovej sheikh

Ghar Shayari

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