जहाँ पर था बसा मेरा मकाँ तन्हा
मैं बेहतर से भी बेहतर था वहाँ तन्हा
दिखावे के बहुत हैं दोस्त रिश्तेदार
हक़ीक़त में है हर इंसाँ यहाँ तन्हा
गुमाँ करते हो क्यूँ तुम माल-ओ-दौलत पर
यहाँ से तुम को जाना है मियाँ तन्हा
महल से जा चुके सब जंग के ख़ातिर
महल में रह गई हैं दासियाँ तन्हा
भरी है दुनिया झूठों से यहाँ पर मैं
सदाक़त की लिए बैठा दुकाँ तन्हा
यहाँ पर सब अकेले ही तो आते हैं
तिरा क्यूँ दिल नहीं लगता यहाँ तन्हा
सनम जब से गए हो तुम तो लगता है
कि जैसे रह गया है आस्ताँ तन्हा
गुलों को ले गया है बाग़ से साहिब
रहा अब बाग़ में बस बाग़बाँ तन्हा
— Rovej sheikh















