बड़ी मुश्किल से नीचे बैठते हैं
जो तेरे साथ उठते बैठते हैं
अकेले बैठना होगा किसी को
अगर हम तुम इकट्ठे बैठते हैं
और अब उठना पड़ा ना अगली सफ़ से
कहा भी था कि पीछे बैठते हैं
यहीं पर सिलसिला मौक़ूफ़ कर दो
ज़ियादा तजरबे ले बैठते हैं
निगाहें क्यूँ न ठहरें उस पे 'आफ़ाक़'
शजर पर ही परिंदे बैठते हैं
— Khurram Afaq















