यही इक बात बस समझा नहीं मैं
ख़ुदा का हूँ मगर उस का नहीं मैं
ग़ज़ल के पास आया हूँ न जब से
किसी के पास ही रहता नहीं मैं
रवानी देख कर चलता रहा हूँ
नदी के पास भी ठहरा नहीं मैं
ख़ुदा ने पर दिए हैं हौसलों के
मगर ऊँचा कभी उड़ता नहीं मैं
तिरी ज़ुल्फ़ें बड़ी ख़म थी ये माना
मगर तू देख ले उलझा नहीं मैं
— Kush Pandey ' Saarang '















