अगर देखा हुआ होता किसी से 'इश्क़ काग़ज़ पर
तो हम ने भी किया होता किसी से 'इश्क़ काग़ज़ पर
बना कर ख़ुद को खोया था कहीं इक नाम के अंदर
तसव्वुर में जिया होता किसी से 'इश्क़ काग़ज़ पर
कभी लफ़्ज़ों की दुनिया में भी तो कुछ रंग होते हैं
कभी तुम ने लिया होता किसी से 'इश्क़ काग़ज़ पर
क़लम से दर्द उभरा था मगर आवाज़ तो छूटी
कभी गाया गया होता किसी से 'इश्क़ काग़ज़ पर
कभी जो धड़कनों में बस के चुपके से बिखरते थे
उन्हें भी तो जिया होता किसी से 'इश्क़ काग़ज़ पर
तेरी आँखों से गिरते ख़्वाब कुछ कहने लगे थे जब
उन्हें भी तो सिया होता किसी से 'इश्क़ काग़ज़ पर
परिंदा भी कभी उड़ता मोहब्बत की सदा लेकर
अगर वो भी लिखा होता किसी से 'इश्क़ काग़ज़ पर
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