अपने लफ़्ज़ों में कि हर चंद अयाँ हूँ मैं भी

बन के ज़ख़्मों की कसक ख़ुद में निहाँ हूँ मैं भी

तेरे आग़ाज़ से अंजाम है रौशन मेरा
बर्ग-ए-आवारा कोई ख़ाक-ए-रवाँ हूँ मैं भी

मो'तबर अब तो बना ऐ निगह-ए-नाज़ मुझे
इस भरे शहर में बेनाम-ओ-निशाँ हूँ मैं भी

वज़्अ'''-दारी का ख़रीदार कहीं से लाओ
अपनी तहज़ीब की उठती सी दुकाँ हूँ मैं भी

तेरे ख़्वाबों से है आबाद ख़राबा मेरा
तेरी यादों में कराँ-ता-ब-कराँ हूँ मैं भी

— Lutf-ur-rahman

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