doodmaan-e-dard ki shaa | दूदमान-ए-दर्द की शादी हैं हम

  - Maatam Fazl Mohammad

दूदमान-ए-दर्द की शादी हैं हम
ख़ानदान-ए-ग़म की आबादी हैं हम

अपनी शूमी से हुई शादी ग़मी
शायद आबादी की बर्बादी हैं हम

अपने आब-ए-चश्म से सरसब्ज़ हैं
ज़ेब-ए-दश्त-ओ-ज़ीनत-ए-वादी हैं हम

दरमियान-ए-ज़िंदगी-ओ-मर्ग हैं
क़ाबिल-ए-सैद ओ न सय्यादी हैं हम

ज़ख़्म-हा-ए-हिज्र में क्या क्या सहे
कुश्तगान-ए-तेग़-ए-फ़ौलादी हैं हम

बंदा-ए-पीरेम या-रब अज़ अज़ाब
मूरिद-ए-अल्ताफ़-ए-आज़ादी हैं हम

हम नहीं कहते मुक़ल्लिद हैं तिरे
तेरे दर के कल्ब-ए-क़िल्लादी हैं हम

दाद कर ऐ दाद-गर उश्शाक़-कुश
तेरे आगे तुझ से फ़रियादी हैं हम

ख़ूँ-बहा माशूक़ से लेते नहीं
आशिक़-ए-इंसाफ़-ए-बेदादी हैं हम

दुख़्तर-ए-रज़ को कोई हम से कहे
तेरे तो हक़दार दामादी हैं हम

हम गुनहगार-ए-जनाब-ए-इश्क़ हैं
अब्द-ए-उब्बादी न आैरादी हैं हम

ऐ अज़ीज़ाँ तर्क-ए-इश्क़-ए-हुस्न में
संग पर जूँ नक़्श-ए-बहज़ादी हैं हम

ला-वलद कहते हैं हम को ला-वलद
शे'र से अज़-बस-कि औलादी हैं हम

आक़िबत ख़ाकी हैं ख़ाकी होंगे ने
आतिशी-ओ-आही-ओ-बादी हैं हम

फ़त्ह-बाग़ी ने नसर-पूरी हैं बल्कि
सिंध में भी हैदराबादी हैं हम

क्या कहें क्या थे कहाँ से आए हैं
मिस्ल-ए-मज़मून-ए-नौ ईरादी हैं हम

फिर भी वो ईराद करने सकता है
जिस के अव्वल बार ईजादी हैं हम

मस्त-ए-अहमद से 'मातम' हैं शकर*
ने सुमूदी क़ौम ने आदी हैं हम

  - Maatam Fazl Mohammad

Shadi Shayari

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