sholon se mohabbat ki mirii jaañ men lagii aag | शोलों से मोहब्बत की मिरी जाँ में लगी आग

  - Maatam Fazl Mohammad

शोलों से मोहब्बत की मिरी जाँ में लगी आग
फिर जाँ से भड़क जिस्म के मैदाँ में लगी आग

ये आतिश-ए-ग़म है कि दम-ए-सर्दस अपने
सर-चश्मा-ए-ख़ुर्शीद-ए-दरख़्शाँ में लगी आग

उस हूर के कूचे में भरे हम जो दम-ए-गर्म
मर्दुम ने कहा रौज़ा-ए-रिज़वाँ में लगी आग

ख़ंदाँ जो हुआ यार हमें देख के गिर्यां
लोगों ने कहा बर्क़ से बाराँ में लगी आग

इन रोज़ों में है रंग जो अश्कों का गुलाबी
शायद कि मिरे दीदा-ए-गिर्यां में लगी आग

गर्मी से नगर के तिरे गुन आब हुआ देख
बुलबुल ने पुकारा कि गुलिस्ताँ में लगी आग

नारी हैं जो परियाँ ये सबब है कि तुम्हारे
नूर-ए-रुख़-ए-रौशन से परिस्ताँ में लगी आग

उस आतिशीं-रू को ब-लब-ए-बाम जो देखा
आलम ने कहा गुम्बद-ए-गर्दां में लगी आग

दरिया में वो धोया था कभी दस्त-ए-हिनाई
हसरत से वहीं पंजा-ए-मर्जां में लगी आग

ग़ैरों की तरफ़ जो नज़र-ए-मेहरस देखा
ग़ैरत से मिरे सीना-ए-सोज़ाँ में लगी आग

क्यूँँ कोहकन-ओ-क़ैस रहें मुझ से न नालाँ
नालों से मिरे कोह-ओ-बयाबाँ में लगी आग

वो सोख़्ता-दिल हूँ मैं पस-अज़-मर्ग जो गुज़रा
मरक़द से मिरे यार के दामाँ में लगी आग

'मातम' है किसी सोख़्ता-दिल का असर-ए-आह
बे-वज्ह नहीं कूचा-ए-जानाँ में लगी आग

  - Maatam Fazl Mohammad

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