आवारगी

मुख़्तसर लम्हों से याद आ गई आवारगी
तुझे पाने की आरज़ू में क़ाएम थे हम
सँवरे सँवरे तेरी तिश्नगी में खो जाते थे हम
तय जो किया था वो भूल जाते थे हम ऐ आवारगी

तेरे इश्क़ में खो जाते थे हम ऐ आवारगी
शहर-ए-निगाराँ में तुझे ढूंँढ़ते थे हम
इस क़दर गोते लगाकर गुम हो जाते थे हम
एक बार जो कहना था वो कह न पाए ऐ आवारगी

ज़ुल्मते शब में तुझे खोजते रहे ऐ आवारगी
ख़्वाबों में भी नज़रों से नज़र हटती नहीं
मौसम-ए-ख़िज़ाँ की तरह चाहत कम न हो जाए
अब तन्हा कहाँ तुझे सोच के हम ऐ आवारगी

— Manohar Shimpi

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