"अल्फ़ाज़"
कुछ अल्फ़ाज़ ही उन के ऐसा असर कर गए
जैसे रेगिस्तान में मुहब्बत के फूल खिल गए
ओस की बूँदों सा चमकता ख़ूब वो ज़र्रा ज़र्रा
और दिल से देखा नज़ारा हरा भरा हो गया
हरियाली और रास्तों का सफ़र शुरू हो गया
जीवन जीने का हर पल फिर सुनहरा हो गया
नज़ारों के साथ फ़ज़ा में भी निखार आ गया
आने वाला हर एक लम्हा फिर हमारा हो गया
तीर-ए-नज़र से दिल गुल से गुलिस्ताँ हो गया
देखते देखते रंग फिर हर गुल पर चढ़ गया
लफ़्ज़ों का सफ़र भी इतना गहरा हो गया
लिखते हुए फिर से लिखने का सुरूर बढ़ गया
— Manohar Shimpi















