"तहरीरी"
मूरत की तरह अगर मैं खड़ा रहूँ
तो न कहना मुझे ये कि
मेरी पहचान ही कोई नहीं है
बेक़दर मत बन और देख मुझ को
ऐ हमनशीं तेरा मुंतज़िर ही हूँ मैं
इम्कान है कि दिल पे पहली चोट
जो हुई है, वो ज़र्ब आज भी है
वो ही ज़र्ब तो मेरी अर्सा-ए-हयात भी है
इत्तिफ़ाक़न तू मिली तो ख़ुश-फ़हम सा खड़ा हूँ मैं
— Manohar Shimpi















