"यार-दोस्त"
यार-दोस्त सफ़र में साथ चलते चले गए
जिन्हें जल्दी थी वो बहुत आगे चले गए
वक़्त के साथ कोई जहाँ थे वहाँ बस गए
वाक़ि'आ और कुछ चेहरे दिल में रह गए
कारवाँ दोस्तों का फिर थोड़ा घटता गया
तन्हाइयों का रह के आलम शुरू हो गया
कोई कसक बचपन की थी बाक़ी रह गई
बिछड़ के न मिलने की छोटी सी भूल हो गई
रुक रुक के चले तो मकाँ सारे याद आ गए
दोस्तों खेलकूद के हसीं वो ज़माने याद आ गए
— Manohar Shimpi















