चोट खा कर भी मुहब्बत से मुहब्बत न गई
दिल लगाने की जो आदत थी वो आदत न गई
सामना मौत से हर-दम ही रहा है सब का
फिर भी इंसान में जीने की ये चाहत न गई
हक़ तो बनता है दिवानों को पज़ीराई का
दश्त सहरा में भी रंगीन तबीअत न गई
लाख भेजे गए दुनिया में पयम्बर लेकिन
इस ख़ुदाई से बुराई की ग़िलाज़त न गई
रश्क करता ही भला कौन मेरी हैअत पर
मेरे चेहरे से कभी यास की रंगत न गई
ज़िंदगी सारी खपा दी थी कमाने में जिसे
हाए अफ़सोस मेरे साथ वो दौलत न गई
हर घड़ी मुझ को रहा दार-ए-अदम का एहसास
उम्र फ़ाक़ों में कटी पर मेरी ग़ैरत न गई
तेरे अंदाज़ में कैसा ये तकब्बुर है 'उमर'
जा लगा फ़र्श से फिर भी तेरी नख़वत न गई















