हैरत से यूँ न देख अनोखा नहीं हूँ मैं
तुम में से मैं भी एक हूँ दूजा नहीं हूँ मैं
मुझ पे तरस न खाइए मजबूर जान कर
टूटा हुआ ज़रूर हूँ बिखरा नहीं हूँ मैं
जितना भी चाहे ज़ुल्म मेरे दिल पे कीजिए
पर ये तो मत समझिए कि ज़िंदा नहीं हूँ मैं
डर मत मेरे सफ़ीने पे रखने से तू क़दम
मझधार में फँसा तो हूँ डूबा नहीं हूँ मैं
रहता तो आज भी हूँ मैं अपने हुदूद में
अपनी जड़ों को आज भी भूला नहीं हूँ मैं
मुझ से तो हो सकेगा न सौदा ज़मीर का
अपनी नज़र से अब तलक उतरा नहीं हूँ मैं
क्या-क्या करूँ बयान 'उमर' अब ज़बान से
किन-किन अज़िय्यतों से गुज़रता नहीं हूँ मैं
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari














