कभी वो दौर भी था लोग ख़ुश-गुफ़्तार होते थे
दयानत-दार अमानत-दार सलीक़ा-दार होते थे
हया होती थी आँखों में सदाक़त उन की बातों में
ग़नी हों चाहे मुफ़लिस साहिब-ए-किरदार होते थे
बदी से दूर रहते थे ख़ुदा का ख़ौफ़ उन में था
कहा जाता है तब सच के अलम-बरदार होते थे
ठगे जाने का कोई डर न लुट जाने का अंदेशा
कभी ईमान वालों से भरे बाज़ार होते थे
क़राबत थी अज़ीज़ों में मुहब्बत हम-नशीनों में
सुना तो ये भी है उस वक़्त सच्चे यार होते थे
समझ कर फ़र्ज़ करते थे कभी मेहमाँ नवाज़ी भी
लगा रहता था मजमा जब कभी बीमार होते थे
महक होती थी तब सौंधी सी मिट्टी से बने घर में
मुहब्बत से भरे घर के दर-ओ-दीवार होते थे
बिताते थे सभी फ़ुर्सत के लम्हे साथ मिलजुल कर
कभी हाथों में चाय साथ में अख़बार होते थे
बहुत छोटी सी दुनिया थी 'उमर' पर ख़ूबसूरत थी
जो कुछ भी था मुयस्सर उस से ही सरशार होते थे














