रौशन है क़ायनात अँधेरा है मुझ में क्यूँ
ये बेख़ुदी ये यास का डेरा है मुझ में क्यूँ
छाया है चारों ओर जवाँ रात का ख़ुमार
तन्हाइयों का फिर भी बसेरा है मुझ में क्यूँ
दिल को लगा के दिल का सुकूँ ही लुटा दिया
मेरी ही जान-ओ-तन का लुटेरा है मुझ में क्यूँ
जिसको मिटाया था तह-ए-दिल से खुरच-खुरच
वो नक़्श फिर किसी ने उकेरा है मुझ में क्यूँ
जीने ही दे मुझे न ये मरने ही दे 'उमर'
यादों ने ऐसा दर्द बिखेरा है मुझ में क्यूँ
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari















