ये तमन्ना है कि कुछ शे'र मुहब्बत पे लिखूँ
जज़्बा-ए-इश्क़ पे दीवानों की फ़ितरत पे लिखूँ
ख़ौफ़ तनक़ीद का इतना है कि हिम्मत न हुई
मैं ख़ुदाओं पे लिखूँ या किसी मूरत पे लिखूँ
कश्मकश में ही रहा तय ही कभी कर न सका
ज़िंदगी पे लिखूँ या मौत की हैबत पे लिखूँ
देखता हूँ तुझे जब जब ये सवाल उठता है
तेरी सूरत पे लिखूँ या तेरी सीरत पे लिखूँ
कुछ समझने से ही कासिर हैं ज़माने वाले
मैं नसीहत पे लिखूँ चाहे फ़ज़ीहत पे लिखूँ
नाम हो जाए सुख़न-वर में मेरा भी शामिल
कुछ अलग लिख दूँ भले जान की क़ीमत पे लिखूँ
दिल में तूफ़ान शरारे भी हैं आँखों में 'उमर'
जी तो करता है रिवाजों से बग़ावत पे लिखूँ














