ख़ाक को ख़ाक में मिलाते हुए

अच्छा लगता है ज़ख़्म खाते हुए

ज़िक्र होता है दोस्तों में तिरा
सिगरेटों का धुआँ उड़ाते हुए

भूल जाता है बे-वफ़ाई को
अपने औसाफ़ वो गिनाते हुए

कौन साँसें तिरी बढ़ाता है
जिस्म पर उँगलियाँ फिराते हुए

तुझ से तो यूँ ही कह रहा था बस
अच्छी लगती है खिलखिलाते हुए

यारों जा कर के उस को समझाओ
खो न दे मुझ को आज़माते हुए

हम को हरगिज़ न ख़ुश समझ लेना
गरचे रहते हैं मुस्कुराते हुए

साम'ईं वाह वाह करते रहे
रो पड़ा मैं ग़ज़ल सुनाते हुए

उस का जाना अजीब था 'क़ैसर'
ख़ुद भी रोया मुझे रुलाते हुए

— Meem Maroof Ashraf

More by Meem Maroof Ashraf

Other ghazal from the same pen

See all from Meem Maroof Ashraf →

Kamar Shayari

Shers of kamar.

All Kamar Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling