वास्ते जिस के सब गँवा डाला

हम को उस शख़्स ने भुला डाला

अच्छे ख़ासे सुकूँ से बैठे थे
फिर किसी याद ने रुला डाला

मिस्ल-ए-का'बा था तुझ को क्या मालूम
वो मकाँ तू ने जो गिरा डाला

बाज़ी-ए-'इश्क़ का न पूछो तुम
जो भी कुछ था वो सब लगा डाला

कल तलक तो वो था लकीरों में
और फिर दफ़'अतन मिटा डाला

प्यार की आख़िरी निशानी था
वो तिरा ख़त भी अब जला डाला

— Meem Maroof Ashraf

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