वो ज़न-ए-ख़ास, ख़ास है कब तक
जब तलक जाँ में जान है तब तक
कह ही देता हूँ 'इश्क़ है तुम से
बात आ ही गई है जब लब तक
कौन होता है आज कल किस का
गरचे हो भी तो अपने मतलब तक
कुछ तो अपना भी हम ख़याल करें
सोचते ही रहें तुम्हें कब तक
रास आ जाए जिस को मैख़ाना
कैसे पहुँचे वो शैख़-साहब तक
एक औरत को चाहते "अशरफ़"
हो गए दस बरस हमें अब तक
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