
सबब जब भी उदासी का किसी ने हम से पूछा है
ज़ुबा पर बे-तकल्लुफ़ फिर तिरा ही नाम आया है
नहीं आता कभी फ़न्न-ए-सुख़न गर साथ वो होता
बिछड़ना यार का 'अशरफ़' के कितना काम आया है
— Meem Maroof Ashraf
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