अच्छी सूरत देख फिसल जाता हूँ मैं
जब भी देखूँ चाँद मचल जाता हूँ मैं
देख बग़ावत अक्सर बीबी बच्चे की
घर से बाहर यार निकल जाता हूँ मैं
राह अकेले चलने में घबराता हूँ
छूटा माँ का हाथ कुचल जाता हूँ मैं
ढ़ाई आखर प्रेम पढ़ा है जीवन में
आग दिलों में देख सँभल जाता हूँ मैं
एक नदी सूखी सा है जीवन मेरा
और ग़मों के संग पिघल जाता हूँ मैं
साथ हमेशा सबका देता ही रहता
वक़्त बुरा हो गर न बदल जाता हूँ मैं
राहत मिलती है ग़ज़लों से ही मीना
अपनी ग़ज़लों में बस ढ़ल जाता हूँ मैं
— Meena Bhatt















