हम ने कहे हैं रोज़ ही शेर-ओ सुख़न तमाम

निखरा न फ़न भले ही किए हैं जतन तमाम

चमका नहीं कहीं भी सितारा नसीब का
हम ने ज़मीं तलाशी तलाशा गगन तमाम

मेहमाँ हैं चंद रोज़ के दुनिया में आप-हम
मिट्टी में फिर तो मिलना है अपना बदन तमाम

तुझ पे करम है रब का है तू शम्अ' बज़्म की
मौजूदगी से तेरी ही क़ायम है फ़न तमाम

गुलशन से हुस्न गुज़रे तो आ जाती है बहार
झुकती है उन के आगे ये शाख़-ए-समन तमाम

छलनी किया है दिल को मेरे नफ़रतों ने ख़ूब
मरहम से उल्फ़तों के मिटेगी जलन तमाम

सहमा हुआ बशर है हर इक सम्त दहशतें
आया है आज ख़तरे में 'मीना' वतन तमाम

— Meena Bhatt

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