ख़्वाब में आज उसे पर्दा-नशीं देख लिया
दिल को महसूस हुआ माह-जबीं देख लिया
आड़ में हुस्न था चिलमन की मगर मैं ने भी
झाँक के पर्दे में वो चेहरा हसीं देख लिया
मेरी दुनिया में ही जन्नत की तलब पूरी हुई
माँ के क़दमों में झुका कर के जबीं देख लिया
सिर्फ़ रिश्वत के तलबगार बने बैठे हो
कैसे दफ़्तर के हो तुम कुर्सी-नशीं देख लिया
इश्क़ करता है गिरफ़्तार सदा आशिक़ को
कितने आशिक़ को यहाँ ज़ेरे-नगीं देख लिया
कल तलक नूर था महफ़िल का जो शाइ'र 'मीना'
हम ने वो शख़्स यहाँ गोशा-नशीं देख लिया
मीना भट्ट सिद्धार्थ
— Meena Bhatt















