पहले चलते थे जो सिक्के वो पुराने गुम हैं
ख़र्च को मिलते थे दो चार जो आने गुम हैं
रिश्तों के बीच खड़ी आज तो दीवारें कई
सब मुहब्बत के पुराने वो ठिकाने गुम हैं
जिन की अज़मत पे था क़ुर्बान जहाँ सारा ही
आज के दौर में वो लोग पुराने गुम हैं
बोलबाला है फ़क़त झूठ का हर ओर यहाँ
अब तो सच्चाई के पिछले वो ज़माने गुम हैं
शोर ही शोर है संगीत कहाँ पहले सा
जो सुकूँ देते थे दिल को वो तराने गुम हैं
तालियाँ बजती थीं महफ़िल में हुनर पे जिन के
मूसिक़ी के सभी नामी ही घराने गुम हैं
अब न अर्जुन सा कोई तीर चलाए 'मीना'
आज गांडीव के वो पिछले निशाने गुम हैं
— Meena Bhatt















