साथ चलना है मुझे अब हौसला हो या न हो
साथ तेरा मेरी क़िस्मत में लिखा हो या न हो
वक़्त-ए-रुख़्सत भी मैं तन्हा जी रही हूँ सब्र से
अब किसी का चाहे मुझ को आसरा हो या न हो
ज़िन्दगी भर मैंने माँगी बंदगी में जो दुआ
क्या पता मंज़ूर मेरी ऐ ख़ुदा हो या न हो
ज़िन्दगी कर दी है तेरे नाम उल्फ़त में सनम
अब भले जीने का कोई मुद्दआ' हो या न हो
क़त्ल तुम ने ही किया है मेरे हर अरमान का
पर अदालत से तुम्हें कोई सज़ा हो या न हो
चाहते हैं मीर-ओ-ग़ालिब जैसा वो अपना मुक़ाम
चाहे उन का शाइरी से राब्ता हो या न हो
ऐ शिकारी तू क़फ़स में क़ैद चाहे रख मुझे
दिल तो है आज़ाद 'मीना' का तेरा हो या न हो
— Meena Bhatt















