ज़ीस्त पर मौत का ये भार रहेगा कब तक
और लाशों का ये व्यापार रहेगा कब तक
मेरी कश्ती को किनारा न मिला क्यूँ कर अब
मेरी साँसों का वो मुख़्तार रहेगा कब तक
ये जो चंगेज़ सा ज़ालिम है अभी गद्दी-नशीन
वो भला मुल्क का सरदार रहेगा कब तक
भर रही ख़ूब कुलांचे तो ये हिरणी वन में
ऐसा मौसम मेरे सरकार रहेगा कब तक
ऐ सुख़न-वर तू क़लम अपनी उठा ले फिर से
पास तेरे भी ये हथियार रहेगा कब तक
कौन किस का हुआ 'मीना' भला इस दुनिया में
हुस्न का कोई तलबगार रहेगा कब तक
— Meena Bhatt















