तरक़्क़ियों का फ़साना सुना दिया मुझ कोअभी हँसा भी न था और रुला दिया मुझ कोखड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिएसवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझ को— Meer Nazeer Baqri