garm hain shor se tujh husn ke bazaar kaii | गर्म हैं शोर से तुझ हुस्न के बाज़ार कई

  - Meer Taqi Meer

गर्म हैं शोर से तुझ हुस्न के बाज़ार कई
रश्क से जलते हैं यूसुफ़ के ख़रीदार कई

कब तलक दाग़ दिखावेगी असीरी मुझ को
मर गए साथ के मेरे तो गिरफ़्तार कई

वे ही चालाकियाँ हाथों की हैं जो अव्वल थीं
अब गरेबाँ में मिरे रह गए हैं तार कई

ख़ौफ़-ए-तन्हाई नहीं कर तू जहाँ से तो सफ़र
हर जगह राह-ए-अदम में मिलेंगे यार कई

इज़तिराब-ओ-क़िल्क़-ओ-ज़ोफ़ में किस तौर जि
यूँँ
जान वाहिद है मिरी और हैं आज़ार कई

क्यूँँ न हूँ ख़स्ता भला मैं कि सितम के तेरे
तीर हैं पार कई वार हैं सोफ़ार कई

अपने कूचे में निकलयो तो सँभाले दामन
यादगार-ए-मिज़ा-ए-'मीर' हैं वाँ ख़ार कई

  - Meer Taqi Meer

Musafir Shayari

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