जी में है याद रुख़-ओ-ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम बहुत

रोना आता है मुझे हर सहर-ओ-शाम बहुत

दस्त-ए-सय्याद तलक भी न मैं पहुँचा जीता
बे-क़रारी ने लिया मुझ को तह-ए-दाम बहुत

एक दो चश्मक इधर गर्दिश-ए-साग़र कि मुदाम
सर चढ़ी रहती है ये गर्दिश-ए-अय्याम बहुत

दिल-ख़राशी-ओ-जिगर-चाकी-ओ-ख़ूँ-अफ़्शानी
हूँ तो नाकाम पे रहते हैं मुझे काम बहुत

रह गया देख के तुझ चश्म पे ये सतर-ए-मिज़ा
साक़िया यूँ तो पढ़े थे मैं ख़त-ए-जाम बहुत

फिर न आए जो हुए ख़ाक में जा आसूदा
ग़ालिबन ज़ेर-ए-ज़मीं 'मीर' है आराम बहुत

— Meer Taqi Meer

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Aankhein Shayari

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