ना किसी से पास मेरे यार का आना गया

बस गया मैं जान से अब उस से ये जाना गया

कुछ न देखा फिर ब-जुज़ यक शोला-ए-पुर-पेच-ओ-ताब
शम्अ''' तक तो हम ने देखा था कि परवाना गया

एक ही चश्मक थी फ़ुर्सत सोहबत-ए-अहबाब की
दीदा-ए-तर साथ ले मज्लिस से पैमाना गया

गुल खिले सद रंग तो क्या बे-परी से ए नसीम
मुद्दतें गुज़रीं कि वो गुलज़ार का जाना गया

दूर तुझ से 'मीर' ने ऐसा तअब खींचा कि शोख़
कल जो मैं देखा उसे मुतलक़ न पहचाना गया

— Meer Taqi Meer

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