रही न पुख़्तगी आलम में दूर ख़ामी है
हज़ार हैफ़ कमीनों का चर्ख़ हामी है
न उठ तो घर से अगर चाहता है हूँ मशहूर
नगीं जो बैठा है गड़ कर तो कैसा नामी है
हुई हैं फ़िक्रें परेशान 'मीर' यारों की
हवा से-ए-ख़मसा करे जम्अ'' सो 'निज़ामी' है
— Meer Taqi Meer
हज़ार हैफ़ कमीनों का चर्ख़ हामी है
न उठ तो घर से अगर चाहता है हूँ मशहूर
नगीं जो बैठा है गड़ कर तो कैसा नामी है
हुई हैं फ़िक्रें परेशान 'मीर' यारों की
हवा से-ए-ख़मसा करे जम्अ'' सो 'निज़ामी' है
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