tera rukh-e-mukhtat quraan hai hamaara | तेरा रुख़-ए-मुख़त्तत क़ुरआन है हमारा

  - Meer Taqi Meer

तेरा रुख़-ए-मुख़त्तत क़ुरआन है हमारा
बोसा भी लें तो क्या है ईमान है हमारा

गर है ये बे-क़रारी तो रह चुका बग़ल में
दो रोज़ दिल हमारा मेहमान है हमारा

हैं इस ख़राब दिल से मशहूर शहर-ए-ख़ूबाँ
इस सारी बस्ती में घर वीरान है हमारा

मुश्किल बहुत है हम सा फिर कोई हाथ आना
यूँ मारना तो प्यारे आसान है हमारा

इदरीस ओ ख़िज़्र ओ ईसा क़ातिल से हम छुड़ाए
उन ख़ूँ-गिरफ़्तगाँ पर एहसान है हमारा

हम वे हैं सुन रखो तुम मर जाएँ रुक के यकजा
क्या कूचा कूचा फिरना उनवान है हमारा

हैं सैद-गह के मेरी सय्याद क्या न धड़के
कहते हैं सैद जो है बे-जान है हमारा

करते हैं बातें किस किस हंगामे की ये ज़ाहिद
दीवान-ए-हश्र गोया दीवान है हमारा

ख़ुर्शीद-रू का परतव आँखों में रोज़ हैगा
यानी कि शर्क़-रूया दालान है हमारा

माहिय्यत-ए-दो-आलम खाती फिरे है ग़ोते
यक क़तरा ख़ून ये दिल तूफ़ान है हमारा

नाले में अपने हर शब आते हैं हम भी पिन्हाँ
ग़ाफ़िल तिरी गली में मिंदान है हमारा

क्या ख़ानदाँ का अपने तुझ से कहें तक़द्दुस
रूहुल-क़ुदूस इक अदना दरबान है हमारा

करता है काम वो दिल जो अक़्ल में न आवे
घर का मुशीर कितना नादान है हमारा

जी जा न आह ज़ालिम तेरा ही तो है सब कुछ
किस मुँह से फिर कहें जी क़ुर्बान है हमारा

बंजर ज़मीन दिल की है 'मीर' मिल्क अपनी
पुर-दाग़ सीना मोहर-ए-फ़रमान है हमारा

  - Meer Taqi Meer

Shehar Shayari

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    Meer Taqi Meer
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    गो आसमाँ ने ख़ाक में हम को मिला दिया

    जानी न क़दर उस गुहर शब चराग़ की
    दिल रेज़ा-ए-ख़ज़फ़ की तरह मैं उठा दिया

    तक़्सीर जान देने में हम ने कभू न की
    जब तेग़ वो बुलंद हुई सर झुका दिया

    गर्मी चराग़ की सी नहीं वो मिज़ाज में
    अब दिल फ़सुर्दगी से हूँ जैसे बुझा दिया

    वो आग हो रहा है ख़ुदा जाने ग़ैर ने
    मेरी तरफ़ से उस के तईं क्या लगा दिया

    इतना कहा था फ़र्श तिरी रह के हम हों काश
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    अब घटते घटते जान में ताक़त नहीं रही
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    Meer Taqi Meer
    है हाल जाए गिर्या-ए-जाँ पर आरज़ू का
    रोए न हम कभू टक दामन पकड़ कसो का

    जाती नहीं उठाई अपने पे ये ख़ुशुनत
    अब रह गया है आना मेरा कभू कभू का

    उस आस्ताँ से किस दिन पुर-शोर सर न पटका
    उस की गली में जा कर किस रात मैं न कूका

    शायद कि मुँद गई है क़मरी की चश्म-ए-गिर्यां
    कुछ टूट सा चला है पानी चमन की जू का

    अपने तड़पने की तो तदबीर पहले कर लूँ
    तब फ़िक्र मैं करूँगा ज़ख़्मों के भी रफ़ू का

    दाँतों की नज़्म उस के हँसने में जिन ने देखी
    फिर मोतियों की लड़ पर उन ने कभू न थूका

    ये ऐश-गा नहीं है याँ रंग और कुछ है
    हर गुल है इस चमन में साग़र भरा लहू का

    बुलबुल ग़ज़ल-सराई आगे हमारे मत कर
    सब हम से सीखते हैं अंदाज़ गुफ़्तुगू का

    गलियाँ भरी पड़ी हैं ऐ बाद ज़ख़्मियों से
    मत खोल पेच ज़ालिम उस ज़ुल्फ़-ए-मुश्क-बू का

    वे पहली इलतिफ़ातें सारी फ़रेब निकलीं
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    Meer Taqi Meer
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    अश्क-ए-फ़क़त का झमका आँखों से लग रहा था

    दामन में आज देखा फिर लख़्त मैं ले आया
    टुकड़ा कोई जिगर का पलकों में रह गया था

    उस क़ैद-ए-जेब से मैं छोटा जुनूँ की दौलत
    वर्ना गला ये मेरा जूँ तौक़ में फँसा था

    मुश्त-ए-नमक की ख़ातिर इस वास्ते हूँ हैराँ
    कल ज़ख़्म-ए-दिल निहायत दिल को मिरे लगा था

    ऐ गर्द-बाद मत दे हर आन अर्ज़-ए-वहशत
    मैं भी कसू ज़माने इस काम में बला था

    बिन कुछ कहे सुना है आलम से मैं ने क्या क्या
    पर तू ने यूँ न जाना ऐ बेवफ़ा कि क्या था

    रोती है शम्अ' इतना हर शब कि कुछ न पूछो
    मैं सोज़-ए-दिल को अपने मज्लिस में क्यूँ कहा था

    शब ज़ख़्म-ए-सीना ऊपर छिड़का था मैं नमक को
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    सर मार कर हुआ था मैं ख़ाक उस गली में
    सीने पे मुझ को उस का मज़कूर नक़्श-ए-पा था

    सो बख़्त-ए-तीरा से हूँ पामाली-ए-सबा में
    उस दिन के वास्ते मैं क्या ख़ाक में मिला था

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    मज़कूर उस का उस के कूचे में जा-ब-जा था

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    बे-दर्द कितने बोले हाँ उस को क्या हुआ था

    कहने लगा कि जाने मेरी बला अज़ीज़ाँ
    अहवाल था किसी का कुछ मैं भी सुन लिया था

    आँखें मिरी खुलीं जब जी 'मीर' का गया तब
    देखे से उस को वर्ना मेरा भी जी जला था
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