याद-ए-अय्याम कि याँ तर्क-ए-शकेबाई था
हर गली शहर की याँ कूचा-ए-रुस्वाई था
इतनी गुज़री जो तिरे हिज्र में सो उस के सबब
सब्र मरहूम 'अजब मोनिस-ए-तन्हाई था
तेरे जल्वे का मगर रू था सहर-ए-गुलशन में
नर्गिस इक दीदा-ए-हैरान तमाशाई था
यही ज़ुल्फ़ों की तिरी बात थी या काकुल की
'मीर' को ख़ूब किया सैर तो सौदाई था
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