"मैं पत्थर हूँ"

कोई हम सफ़र नहीं मेरा
मेरा कोई हमनवा नहीं है
फ़ुर्क़तों की घुटन है सिर्फ़
क़ुर्बतों की कोई हवा नहीं है

मुझे लगता था शख़्स वो जाएगा
तो फ़िज़ूल मरने मारने लगूँगा
मगर लगता है ख़्याल-ए-यार
बिन ही दिन गुज़ारने लगूंगा

कहाँ तो उस की चाहत से मन हटता नहीं था
कहाँ अब मन भी नहीं करता उसे चाहने का
उस की गली से गुज़रने का बहाना बना कर मैं तो
शर्मसार हो गया हूँ ख़ुद ही के बहाने का

ले जाए मुझे भी
कोई गर जा रहा है
इस जहाँ से तो
भटकते हैं जहाँ साए
वो भी जगह बेहतर होगी
इस जहाँ से तो

मोहब्बत के बग़ैर जीना ऐसे है
बिना चमक के कोई नगीना जैसे है
लोग जानते भी हैं के शाइ'र हूँ मैं
फिर भी है सवाल, "तू इतना कमीना कैसे है?"

सीख लिया है अब तो 'आकर्ष' उस के बिना भी रहना
क़ैद क़ब्र में हूँ ख़ुद को मगर ज़िंदा ही कहना

नज़र से नज़र नहीं मिलेगी
वो सामने भी गर आए तो
मेरी आँखें भी न छलकेंगी शायद
वो आज मार भी गर जाए तो

घरवाले कहते तो हैं मैं पत्थर हूँ
लगाने मुझे भी लगा है मैं पत्थर हूँ
कर दिया था सौदा दिलों का मुक़र्रर मैं ने
दिल-ए-बे-रुख़ मगर चिल्ला पड़ा मैं पत्थर हूँ

— Aakarsh Goyal 'Mehtaab'

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