"न जाने कब"

न जाने कब वो उतरेगी मेरे दिल से
न जाने कब मैं किसी और को चाहूँगा
न जाने कब उस की आँखों के दरिया से मेरे ख़्वाब पानी भरना छोड़ेंगे
न जाने कब मेरी क़लम की कश्ती उस की अदाओं के ज़जीरें से रवाना होगी
न जाने कब मुझे कोई और साहिल मिलेगा
न जाने कब उस की गली से गुज़रना फि़ज़ूल लगेगा मुझे
न जाने कब ये बाँहें मोहब्बत के रास्ते पर किसी और की राह देखेंगी
न जाने कब ये काग़ज़ ख़फ़ा होंगे क़िस्सों से उस के
न जाने कब ये सियाही, उस पर लिखे कलाम पे गिरेगी
न जाने कब वो मेरे दिल से उतरेगी
न जाने कब मैं किसी और को चाहूँगा

— Aakarsh Goyal 'Mehtaab'

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