tum salaamat raho hazaar baras | तुम सलामत रहो हज़ार बरस

  - Mirza Ghalib

तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हर बरस के हों दिन पचास हज़ार

  - Mirza Ghalib

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    दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं
    ख़ाक ऐसी ज़िंदगी पे कि पत्थर नहीं हूँ मैं

    क्यूँ गर्दिश-ए-मुदाम से घबरा न जाए दिल
    इंसान हूँ पियाला ओ साग़र नहीं हूँ मैं

    या-रब ज़माना मुझ को मिटाता है किस लिए
    लौह-ए-जहाँ पे हर्फ़-ए-मुकर्रर नहीं हूँ मैं

    हद चाहिए सज़ा में उक़ूबत के वास्ते
    आख़िर गुनाहगार हूँ काफ़र नहीं हूँ मैं

    किस वास्ते अज़ीज़ नहीं जानते मुझे
    लअ'ल ओ ज़मुर्रद ओ ज़र ओ गौहर नहीं हूँ मैं

    रखते हो तुम क़दम मिरी आँखों से क्यूँ दरेग़
    रुत्बे में महर-ओ-माह से कम-तर नहीं हूँ मैं

    करते हो मुझ को मनअ-ए-क़दम-बोस किस लिए
    क्या आसमान के भी बराबर नहीं हूँ मैं

    'ग़ालिब' वज़ीफ़ा-ख़्वार हो दो शाह को दुआ
    वो दिन गए कि कहते थे नौकर नहीं हूँ मैं
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    Mirza Ghalib
    अर्ज़-ए-नाज़-ए-शोख़ी-ए-दंदाँ बराए-ख़ंदा है
    दावा-ए-जमियत-ए-अहबाब जा-ए-ख़ंदा है

    है अदम में ग़ुंचा महव-ए-इबरत-ए-अंजाम-ए-गुल
    यक-जहाँ ज़ानू तअम्मुल दर-क़फ़ा-ए-ख़ंदा है

    कुल्फ़त-ए-अफ़्सुर्दगी को ऐश-ए-बेताबी हराम
    वर्ना दंदाँ दर दिल अफ़्शुर्दन बिना-ए-ख़ंदा है

    शोरिश-ए-बातिन के हैं अहबाब मुंकिर वर्ना याँ
    दिल मुहीत-ए-गिर्या ओ लब आशना-ए-ख़ंदा है

    ख़ुद-फ़रोशी-हा-ए-हस्ती बस-कि जा-ए-ख़ंदा है
    हर शिकस्त-ए-क़ीमत-ए-दिल में सदा-ए-ख़ंदा है

    नक़्श-ए-इबरत दर नज़र या नक़्द-ए-इशरत दर बिसात
    दो-जहाँ वुसअत ब-क़द्र-ए-यक-फ़ज़ा-ए-ख़ंदा है

    जा-ए-इस्तिहज़ा है इशरत-कोशी-ए-हस्ती 'असद'
    सुब्ह ओ शबनम फ़ुर्सत-ए-नश्व-ओ-नुमा-ए-ख़ंदा है
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    Mirza Ghalib
    हुज़ूर-ए-शाह में अहल-ए-सुख़न की आज़माइश है
    चमन में ख़ुश-नवायान-ए-चमन की आज़माइश है

    क़द ओ गेसू में क़ैस ओ कोहकन की आज़माइश है
    जहाँ हम हैं वहाँ दार-ओ-रसन की आज़माइश है

    करेंगे कोहकन के हौसले का इम्तिहान आख़िर
    अभी उस ख़स्ता के नेरवे तन की आज़माइश है

    नसीम-ए-मिस्र को क्या पीर-ए-कनआँ' की हवा-ख़्वाही
    उसे यूसुफ़ की बू-ए-पैरहन की आज़माइश है

    वो आया बज़्म में देखो न कहियो फिर कि ग़ाफ़िल थे
    शकेब-ओ-सब्र-ए-अहल-ए-अंजुमन की आज़माइश है

    रहे दिल ही में तीर अच्छा जिगर के पार हो बेहतर
    ग़रज़ शुस्त-ए-बुत-ए-नावक-फ़गन की आज़माइश है

    नहीं कुछ सुब्हा-ओ-ज़ुन्नार के फंदे में गीराई
    वफ़ादारी में शैख़ ओ बरहमन की आज़माइश है

    पड़ा रह ऐ दिल-ए-वाबस्ता बेताबी से क्या हासिल
    मगर फिर ताब-ए-ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन की आज़माइश है

    रग-ओ-पय में जब उतरे ज़हर-ए-ग़म तब देखिए क्या हो
    अभी तो तल्ख़ी-ए-काम-ओ-दहन की आज़माइश है

    वो आवेंगे मिरे घर वा'दा कैसा देखना 'ग़ालिब'
    नए फ़ित्नों में अब चर्ख़-ए-कुहन की आज़माइश है
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    Mirza Ghalib
    देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़
    इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है
    Mirza Ghalib
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    अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा
    जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा

    जाता हूँ दाग़-ए-हसरत-ए-हस्ती लिए हुए
    हूँ शम-ए-कुश्ता दर-ख़ुर-ए-महफ़िल नहीं रहा

    मरने की ऐ दिल और ही तदबीर कर कि मैं
    शायान-ए-दस्त-ओ-बाज़ु-ए-क़ातिल नहीं रहा

    बर-रू-ए-शश-जहत दर-ए-आईना बाज़ है
    याँ इम्तियाज़-ए-नाक़िस-ओ-कामिल नहीं रहा

    वा कर दिए हैं शौक़ ने बंद-ए-नक़ाब-ए-हुस्न
    ग़ैर-अज़-निगाह अब कोई हाइल नहीं रहा

    गो मैं रहा रहीन-ए-सितम-हा-ए-रोज़गार
    लेकिन तिरे ख़याल से ग़ाफ़िल नहीं रहा

    दिल से हवा-ए-किश्त-ए-वफ़ा मिट गई कि वाँ
    हासिल सिवाए हसरत-ए-हासिल नहीं रहा

    बेदाद-ए-इश्क़ से नहीं डरता मगर 'असद'
    जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा

    हर-चंद मैं हूँ तूती-ए-शीरीं-सुख़न वले
    आईना आह मेरे मुक़ाबिल नहीं रहा

    जाँ-दाद-गाँ का हौसला फ़ुर्सत-गुदाज़ है
    याँ अर्सा-ए-तपीदन-ए-बिस्मिल नहीं रहा

    हूँ क़तरा-ज़न ब-वादी-ए-हसरत शबाना रोज़
    जुज़ तार-ए-अश्क जादा-ए-मंज़िल नहीं रहा

    ऐ आह मेरी ख़ातिर-ए-वाबस्ता के सिवा
    दुनिया में कोई उक़्दा-ए-मुश्किल नहीं रहा

    अंदाज़-ए-नाला याद हैं सब मुझ को पर 'असद'
    जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा
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    Mirza Ghalib

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